भारत में यूरोपीयों का आगमन

भूमिका

1707 में मुगल बादशाह औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् मुगल साम्राज्य की पतनोन्मुखी परिस्थितियों का लाभ उठाकर कई अधीनस्थ राज्यों ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर तो लिया, किंतु भारत में ऐसा कोई शक्तिशाली राज्य नहीं था, जो भारत को एक सूत्र में बांध सके। इस कारण भारत में प्रारंभिक व्यापारिक एकाधिकार प्राप्त करने के उद्देश्य से यूरोपीय कंपनियों के बीच क्षेत्रीय राज्यों के सहयोग से एक चतुर्भुजी संघर्ष प्रारंभ हो गया। अंततः इस संघर्ष में अंग्रेजों को विजयश्री प्राप्त हुई। कालांतर में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय राज्यों को जीतकर, भारत में अपने उपनिवेश की स्थापना की।

भारत में यूरोपीय कंपनियों का आगमन

भारत में यूरोपीय कंपनियों का आगमन कोई आकस्मिक घटना नहीं थी। यूरोप के साथ भारत के व्यापारिक संबंध बहुत पुराने (यूनानियों के समय से) थे। मध्यकाल में यूरोप और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ भारत का व्यापार अनेक मार्गों से चलता था। सवाल उठता है, आखिर ऐसी क्या परिस्थितियाँ बनीं कि यूरोपीयों को एशिया से व्यापार के लिये पुनः नए मार्गों की खोज करनी पड़ी?

ध्यातव्य है कि जब वर्ष 1453 में उस्मानिया सल्तनत ने एशिया माइनर को जीत लिया और कुस्तुन्तुनिया पर अधिकार कर लिया तो पूर्व और पश्चिम के बीच के पुराने व्यापारिक मार्ग तुकों के नियंत्रण में आ गए। इस तरह पूर्वी देशों और यूरोप के बीच पारंपरिक व्यापारिक मार्ग पर अंकुश लग गया। इस प्रकार उत्पन्न परिस्थितियों के कारण पश्चिमी यूरोपीय देशों के व्यापारी भारत और इंडोनेशिया के स्पाइस आइलैंड (मसाले के द्वीप) के लिये नए और अधिक सुरक्षित समुद्री मार्गों की तलाश करने लगे।

प्रारंभ में यूरोपीयों की मंशा व्यापार में लगे अरबों और वेनिसवासियों के एकाधिकार को तोड़ना, तुर्कों की शत्रुता मोल लेने से बचना और पूर्व के साथ सीधे व्यापार-संबंध स्थापित करने की थी।

यूरोपीयों के लिये अब नए समुद्री मार्ग खोजना उतना कठिन कार्य नहीं था, क्योंकि 15वीं-16वीं सदी तक यूरोप में पुनर्जागरण व प्रबोधन के परिणामस्वरूप नई भौगोलिक खोजों को केंद्रीय सत्ता द्वारा प्रोत्साहन दिया जा रहा था, साथ ही जहाज निर्माण और समुद्री यातायात में प्रगति तथा कुतुबनुमा (दिशा सूचक) का आविष्कार भी हो गया था। फलतः यूरोपीय लोग अब यह कार्य करने में अच्छी तरह समर्थ थे।

नए समुद्री मार्गों की खोज का पहला कदम पुर्तगाल और स्पेन ने उठाया। इन देशों के नाविकों ने अपनी-अपनी सरकारों की सहायता से भौगोलिक खोजों का एक नया युग प्रारंभ किया।

इसी पृष्ठभूमि में स्पेन का नाविक कोलंबस 1492 में भारत की खोज में निकला, परतु वह भटक कर अमेरिका चला गया। इस प्रकार उसने अमेरिका की खोज की। 1498 में पुर्तगाल के नायिक वास्कोडिगामा ने एक नया समुद्री मार्ग खोज निकाला, जिससे वह उत्तमाशा अंतरीप (केप ऑफ गुड होप) का चक्कर काटते हुए भारत के कालीकट तट (केरल) पर पहुँचा। ध्यातव्य है कि उत्तमाशा अंतरीप की खोज बार्थोलोम्यू डियाज ने 1488 में की थी।

पुर्तगालियों का आगमन

सर्वप्रथम 1498 में वास्कोडिगामानामक पुर्तगाली नाविक उत्तमाश अंतरीप का चक्कर काटते हुए एक गुजराती व्यापारी अब्दुल मजीद की सहायता से भारत के कालीकटबंदरगाह पर पहुँचा। जहाँ कालीकरके हिंदू शासक (उपाधि-जमोरिन) ने उसका स्वागत किया।

वास्कोडिगामा ने कालीकट के राजा से व्यापार का अधिकार प्राप्त किया, जिसका अरबी व्यापारियों ने विरोध किया। विरोध का कारण आर्थिक हित था। अंततः वास्कोडिगामा जिस मसालों को लेकर वापस स्वदेश लौटा, वह पूरी यात्रा की कीमत के 60 गुना दामों पर बिका। परिणामतः इस लाभकारी घटना ने पुर्तगाली व्यापारियों को भारत आने के लिये आकर्षित किया।

ध्यातव्य है कि पूर्व के साथ व्यापार हेतु इस्तादो-द-इंडियानामक कंपनी की स्थापना की गई। वास्तव में पोप अलैक्जेंडर VI द्वरा 1453 में ही पूर्वी सामुद्रिक व्यापार हेतु आज्ञापत्र दे दिया गया था।

1500 में पेड्रो अल्वरेज कैब्रालके नेतृत्व में दो जहाजी बेड़े भारत आए।

वास्कोडिगामा 1502 में दूसरी बार भारत आया। इसके बाद पुर्तगालियों का भारत में निरंतर आगमन प्रारंभ हुआ। पुर्तगालियों की पहली फैक्ट्री कालीकट में स्थापित हुई, जिसे जमोरिन द्वारा बाद में बद करवा दिया गया।

1503 में काली मिर्च और मसालों के व्यापार पर एकाधिकार प्राप्त करने के उद्देश्य से पुर्तगालियों ने कोचीन के पास अपनी पहली व्यापारिक कोठी बनाई। इसके बाद कन्नूर (1505) में पुर्तगालियों ने अपनी दूसरी फैक्ट्री बनाई।

पुर्तगाली वायसराय

फ्राँसिस्को-डी-अल्मीडा‘ (1505-1509) भारत में पहला पुर्तगाली

वायसराय बनकर आया। उसने भारत पर प्रभुत्व स्थापित करने के लिये मज्जबूत सामुद्रिक नीति का संचालन किया, जिसे ब्लू वाटर पॉलिसीअथवा शांत जल की नीतिकहा जाता है।

1508 में वह चौल के युद्धमें गुजरात के शासक से संभवतः परास्त हुआ, किंतु 1509 में उसने महमूद बेगडा मिस्र तथा तुर्की शासकों के समुद्री बेड़े को पराजित किया।

अल्फांसो डी-अल्बकर्क‘ (1509-1515) दूसरा वायसराय बनकर आया। उसने अल्मीडा की ब्लू वाटर पॉलिसीको बंद करवाया। 1510 में उसने बीजापुर के शासक युसूफ आदिलशाह से गोवा छीन लिया यहीं से पुर्तगाली साम्राज्य की नींव पड़ी। अल्बुकर्क को भारत में पुर्तगाली साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।

विजयनगर शासक, कृष्णदेव राय ने पुर्तगालियों को भटकल में दुर्ग बनाने की इजाजत दी। अल्बुकर्क ने पुर्तगालियों को भारतीय स्त्रियों से विवाह करने के लिये प्रोत्साहित किया।

नीनो-डी-कुन्हा‘ (1529-1538) अल्बुकर्क के बाद सबसे महत्त्वपूर्ण वायसराय था। 1530 में कोचीन की जगह गोवा को पुर्तगालियों की राजधानी बनाया और सेंट टोमे तथा हुगली में पुर्तगाली बस्तियाँ बसाई।

नीनो-डी-कुन्हा ने गुजरात के शासक बहादुरशाह से मुलाकात के दौरान जहाज पर उसकी हत्या कर बसीन (1534) व दीव (1535) पर आधिपत्य स्थापित कर लिया।

धीरे-धीरे पुर्तगालियों ने हिंद महासागर में होने वाले व्यापार पर एकाधिकार कर लिया। कार्टेज पद्धतिलागू की जो एक प्रकार का लाइसेंस था। यदि कोई देश या व्यक्ति अपने जहाज को किसी एशियाई देश में भेजना चाहता था तो उसे कार्टेज लेना आवश्यक था जिसके लिये निर्धारित शुल्क देना होता था। उल्लेखनीय है कि अकबर ने भी समुद्री व्यापार हेतु कार्टेज स्वीकार कर लिया था।

पुर्तगालियों ने फारस की खाड़ी, हॉरमुज तथा हिंद महासागर में अपनी चौकियाँ स्थापित की। भारत का जापान के साथ व्यापार का श्रेय भी पुर्तगालियों को जाता है।

पुर्तगालियों के आगमन से भारत में तंबाकू, आलू, टमाटर की खेती, जहाज निर्माण तथा प्रिटिंग प्रेस की शुरुआत हुई। स्थापत्य कला में गोथिक कला का विकास हुआ। भारत में पुर्तगाली साम्राज्य के पतन के कारणों में धार्मिक असहिष्णुता, भारतीय व्यापारियों संग लूटपाट, भारतीय महिलाओं संग वैवाहिक नीति आदि का मराठों व मुगलों द्वारा विरोध किया जाना था। 1632 में शाहजहाँ ने पुर्तगालियों को हुगली से भगाया।

1661 में पुर्तगाली राजकुमारी केथरीन का विवाह ब्रिटिश राजकुमार चार्ल्स द्वितीय से हो गया जिससे भारत में बंबई क्षेत्र ब्रिटिशों को दहेज के तौर पर प्राप्त हो गया। बाद में बंबई को 10 पाउण्ड वार्षिक किराये पर ब्रिटिश कंपनी को दे दिया गया; साथ ही तत्कालीन स्पेन में पुर्तगाल के शामिल हो जाने पर स्पेन सरकार का कंपनियों पर नियंत्रण बढ़ गया जिससे पुर्तगालियों की उपनिवेश संबंधी गतिविधियाँ पश्चिम की तरफ उन्मुख हो गई।

इचों का आगमन

पुर्तगालियों के पश्चात् डचों का आगमन हुआ। डच, हॉलैंड (वर्तमान नीदरलैंड्स) के निवासी थे।

1596 में कॉर्नेलिस डी हाउटमैन (Cornelis de houtman) केप ऑफ गुड होप होते हुए सुमात्रा तथा बाण्टेन पहुँचने वाला प्रथम डेच नागरिक था।

1602 में डच कंपनी वेरिंगदे ओस्त इंडसे कंपनी‘ (VOC) की स्थापना हुई, जिसे डच संसद ने एक चार्टर जारी करके कंपनी को युद्ध करने, संधि करने, इलाके जीतने और किले बनाने का अधिकार दे दिया था। बाद में विभिन्न डच कंपनियों को मिलाकर यूनाइटेड ईस्ट इंडिया कंपनी ऑफ नीदरलैंडके नाम से एक विशाल व्यापारिक संस्थान की स्थापना की गई।

डच प्रारंभ में इंडोनेशिया तक केंद्रित थे तथा मसालों के व्यापार में संलग्न थे। जब भारत के साथ इनका संपर्क हुआ तब इन्होंने व्यापार में सूती वस्त्र के व्यापार को भी शामिल किया, जिनका इन्हें अत्यधिक लाभ मिला।

डचों की पहली फैक्ट्री 1605 में पूर्वी तट पर मसुलीपट्टनम में स्थापित हुई, जहाँ से वे अपने सिक्के भी ढालते थे। परंतु आगे चलकर नेगापट्टनम‘ (नागपट्टनम) को मुख्यालय बना दिया।

डचों ने 1619 में जकार्ता को जीतकर बैटेविया नामक नगर की स्थापना की। 1641 में मलक्का और 1658 (अन्य स्रोतों में 1659) में पुर्तगालियों से श्रीलंका को जीतकर अपने कब्जे में कर लिया।

व्यापारिक स्वार्थों से प्रेरित होकर डचों ने भारत में कोरोमंडल समुद्र तट पर बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा में व्यापारिक कोठियाँ (फैक्ट्रियाँ) स्थापित की। भारत में उनकी महत्त्वपूर्ण फैक्ट्रियाँ पुलीकट, सूरत, कारिकल, चिनसुरा, कासिम बाजार, बड़ा नगर, पटना, बालासोर, नागपट्टनम, कोचीन आदि में थी। डचों की अधिकांश व्यापारिक फैक्ट्रियाँ पूर्वी तट पर थीं, क्योंकि ये इंडोनेशिया से भी जुड़े थे।

डचों द्वारा भारत से नील, शोरा और सूती वस्त्र का निर्यात किया जाता था। भारत से वस्त्र को निर्यात की वस्तु बनाने का श्रेय डचों को जाता है।

डचों की व्यापारिक व्यवस्था का उल्लेख 1722 के दस्तावेजों में मिलता है। यह कार्टल (Cartel) पर आधारित व्यवस्था थी।

डच कंपनी का नियंत्रण सीधे डच सरकार के हाथ में था। परिणामतः कंपनी अपनी इच्छानुसार विस्तार नहीं कर सकती थी, जो कंपनी के पतन का प्रमुख कारण बनी। इसके अलावा, अपने प्रतिद्वंद्वी अंग्रेजों की तुलना में डचों की नौसैनिक शक्ति कमजोर थी और दक्षिण-पूर्वी एशिया के द्वीपों पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित रखने के कारण कालांतर में वे भारत में अंग्रेजों और फ्राँसीसियों के साथ निर्णायक प्रतिस्पर्द्धा नहीं कर सके।

डचों का भारत में अंतिम रूप से पतन 1759 में अंग्रेजों एवं डचों के मध्य बेदरा के युद्धके बाद हुआ।

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का आगमन

1599 में मर्चेंट एडवेंचरर्स नाम से विख्यात कुछ व्यापारियों ने पूर्व से व्यापार करने के उद्देश्य से गवर्नर एंड कंपनी ऑफ मर्चेंट ऑफ लंदन ट्रेडिंग टू द ईस्ट इंडीजनामक कंपनी की स्थापना की। कालांतर में इसी कंपनी का नाम संक्षिप्त करके ईस्ट इंडिया कंपनीकर दिया गया।

31 दिसंबर, 1600 को महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने एक रॉयल चार्टरजारी कर इस कंपनी को प्रारंभ में 15 वर्ष के लिये पूर्वी देशों से व्यापार करने का एकाधिकार पत्र दे दिया। किंतु आगे चलकर 1609 में ब्रिटिश सम्राट जेम्स प्रथम ने कंपनी को अनिश्चितकालीन व्यापारिक एकाधिकार प्रदान किया।

1608 में इस कंपनी ने भारत के पश्चिमी तट पर सूरत में एक फैक्ट्री खोलने का निश्चय किया, तब व्यापारिक कंपनी ने कैप्टन हॉकिंस को जहाँगीर के दरबार में शाही आज्ञा लेने के लिये भेजा। परिणामस्वरूप एक शाही फरमान के द्वारा सूरत में फैक्ट्री खोलने की इजाजत मिल गई। हॉकिंस फारसी भाषा का बहुत अच्छा जानकार था।

1611 में मुगल बादशाह जहाँगीर के दरबार में अंग्रेज कैप्टन मिडल्टन पहुँचा और व्यापार करने की अनुमति पाने में सफल हुआ। जहाँगीर ने 1613 में सूरत में अंग्रेजों को स्थायी कारखाना स्थापित करने की अनुमति प्रदान की। अंग्रेज कैप्टन बेस्ट द्वारा सूरत के समीप स्वाल्ली में पुर्तगालियों के जहाती बेड़े को पराजित कर उनके व्यापारिक एकाधिकार को भंग किया गया।

1615 में इंग्लैंड के सम्राट जेम्स प्रथम का एक दूत सर टॉमस रो जहाँगीर के दरबार में आया। उसका उद्देश्य एक व्यापारिक संधि करना था। सर टॉमस रोने मुगल साम्राज्य के सभी भागों में व्यापार करने एवं फैक्ट्रियाँ स्थापित करने का अधिकार पत्र प्राप्त कर लिया।

1623 तक अंग्रेजों ने सूरत, आगरा, अहमदाबाद, मछलीपट्टनम (मसुलीपट्टनम) तथा भड़ौच में अपनी व्यापारिक कोठियों की स्थापना कर ली थी।

दक्षिण भारत में अंग्रेजों ने अपनी प्रथम व्यापारिक कोठी की स्थापना 1611 में मसुलीपट्टनम की। तत्पश्चात् 1639 में मद्रास में व्यापारिक कोठी खोली गई।

पूर्वी भारत में अंग्रेजों द्वारा स्थापित प्रथम कारखाना 1633 में उड़ीसा के बालासोर में खोला गया और 1651 में हुगली नगर में व्यापार करने की अनुमति मिल गई। तत्पश्चात् बंगाल, बिहार, पटना और ढाका में भी कारखाने खोले गए।

फ्राँसिस डे ने 1639 में चंद्रगिरी के राजा से मद्रास को पट्टे पर ले लिये, जहाँ कालांतर में एक किलेबंद कोठी बनाई गई। इसी कोठी को फोर्ट सेंट जॉर्जनाम दिया गया।

1632 में गोलकुंडा के सुल्तान द्वारा अंग्रेजों को एक सुनहरा फरमानके माध्यम से गोलकुंडा राज्य में स्वतंत्रतापूर्वक व्यापार करने की अनुमति मिल गई।

1668 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने ब्रिटिश सरकार से बंबई को प्राप्त किया। अपनी भौगोलिक अवस्थिति के कारण पश्चिमी तट पर कंपनी के मुख्यालय के रूप के बंदरगाहों में सूरत का स्थान जल्द ही मुंबई ने ले लिया।

1686 में अंग्रेजों ने हुगली को लूट लिया। परिणामस्वरूप उनका मुगल सेनाओं से संघर्ष हुआ। जिसके बाद कंपनी को सूरत, मसुलीपट्टनम, विशाखापट्टनम आदि के कारखानों से अपने अधिकार खोने पड़े, परंतु अंग्रेजों द्वारा क्षमायाचना करने पर औरंगजेब ने उन्हें डेढ़ लाख रुपया मुआवजा देने के बदले पुनः व्यापार के अधिकार प्रदान कर दिये।

1691 में जारी एक शाही फरमान के तहत एकमुश्त वार्षिक कर के बदले कंपनी को बंगाल में सीमा शुल्क से छूट दे दी गई।

1698 में अजीमुशान द्वारा अंग्रेजों को सुतानती, कलिकाता (कालीघाट-कलकत्ता) और गोविंदपुर नामक तीन गाँवों की जमींदारी

मिल गई। इन्हीं को मिलाकर जॉब चार्नाक ने कलकत्ता की नीव रखी। कंपनी की इस नई किलेबंद बस्ती को फोर्ट विलियम का नाम दिया गया। इस किलेबंद बस्ती के सुचारु प्रशासन के लिए एक प्रेसिडेंट और काउंसिल की व्यवस्था की गई और चार्ल्स आयर को प्रथम प्रेसिडेंट नियुक्त किया गया।

कलकत्ता को अंग्रेजों ने 1700 में पहला प्रेसिडेंसी नगर घोषित किया। कलकत्ता 1774 से 1911 तक ब्रिटिश भारत की राजधानी बना रहा।

1717 में मुगल सम्राट फर्रुखसियर का इलाज कंपनी के एक डॉलरा विलियम हैमिल्टन द्वारा किये जाने से फर्रुखसियर ने कंपनी को व्यापारिक सुविधाओं वाला एक फरमान जारी किया। फरमान के अंतर्गत एक निश्चित वार्षिक कर (3000 रुपये) चुकाकर निःशुल्क व्यापार करने तथा बंबई में कंपनी द्वारा ढाले गए सिक्कों के संपूर्ण मुगल राज्य में चलाने की आज्ञा मिल गई। उन्हें वही कर देने पड़ते थे जो भारतीय को भी देने होते थे। ब्रिटिश इतिहासकार ओमर्स इस फरमान को कंपनी का महाधिकार पत्र‘ (मैग्नाकार्टा) कहा है।

भारत में कंपनी की फैक्ट्री एक किलाबंद क्षेत्र जैसी होती थी, जिसके अंदर गोदाम, दफ्तर और कंपनी के कर्मचारियों के लिये घर होते थे।

डेनिसों का आगमन

अंग्रेजों के बाद डेन 1616 में भारत आए।

डेनिसों ने 1620 में ट्रैकोबार तथा 1676 में सेरामपोर (बंगाल) में अपनी फैक्ट्रियाँ स्थापित कीं।

यह कंपनी भारत में अपनी स्थिति मजबूत करने में असफल रही और 1845 तक अपनी सारी फैक्ट्रियाँ अंग्रेजों को बेचकर चली गई।

यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों से संबद्ध व्यक्ति
वास्कोडिगामाभारत आने वाला प्रथम पुर्तगाली यात्री
कैब्रालभारत आने वाला द्वितीय पुर्तगाली
फ्रांसिस्को-डी-अल्मीडाभारत आने वाला प्रथम पुर्तगाली वायसराय
कैप्टन हॉकिंसप्रथम अंग्रेज्जत दूत जिसने सम्राट जहाँगीर से भेंट की।
गेराल्ड ऑन्गियारबंबई का संस्थापक
जॉब चार्नाककलकत्ता का संस्थापक
चार्ल्स आयरफोर्ट विलियम (कलकत्ता) का प्रथम प्रेसिडेंट।
फ्रैंको मार्टिन पॉण्डिचेरी का प्रथम फ्राँसीसी गवर्नर
फ्राँसिस डे  मद्रास का संस्थापक
जॉन सुरमन मुगल सम्राट फर्रुखसियर से विशेष व्यापारिक सुविधा प्राप्त करने वाले शिष्टमंडल का मुखिया।
फ्रैंकोइस कैरोभारत में प्रथम फ्राँसीसी फैक्ट्री की स्थापना सूरत में की।

फ्राँसीसियों का आगमन

फ्राँसीसियों ने भारत में अन्य यूरोपीय कंपनियों की अपेक्षा सबसे बाद में प्रवेश किया।

सन् 1664 में फ्राँस के सम्राट लुई चौदहवें के मंत्री कोल्बर्ट के प्रयास से फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनीकी स्थापना हुई, जिसे कंपने फ्रैंकेस देस इंडेस ओरिएंटलेस‘ (Compagnie Francaise Des Indes Orientales) कहा गया।

फ्राँसीसी कंपनी का निर्माण फ्राँस सरकार द्वारा किया गया तथा इसका सारा खर्च सरकार ही वहन करती थी। इसे सरकारी व्यापारिक कंपनी भी कहा जाता था, क्योंकि यह कंपनी सरकार द्वारा संरक्षित एवं आर्थिक सहायता पर निर्भर थी। 1668 में फ्रैंकोइस कैरो द्वारा सूरत में प्रथम फ्राँसीसी फैक्ट्री की स्थापना की गई।

गोलकुंडा रियासत के सुल्तान से अधिकार पत्र प्राप्त करने के पश्चात् सन् 1669 में मसुलीपट्टनम में दूसरी व्यापारिक कोठी स्थापित की गई।

1673 में कंपनी के निदेशक फ्रैंको मार्टिन ने वलिकोंडापुरम के सूबेदार शेर खाँ लोदी से कुछ गाँव प्राप्त किए, जिसे कालांतर में पॉण्डिचेरीके नाम से जाना गया। पॉण्डिचेरी में फ्राँसीसियों द्वारा फोर्ट लुईनामक किला बनवाया गया।

1673 में बंगाल के नवाब शाइस्ता खाँ ने फ्राँसीसियों को एक जगह किराए पर दी, जहाँ चंद्रनगरकी सुप्रसिद्ध कोठी की स्थापना की गई। यहाँ का किला फोर्ट ओरलिएसकहा जाता है।

फ्राँसीसियों द्वारा 1721 में मॉरीशस, 1725 में मालाबार में स्थित माहे एवं 1739 में कारीकल पर अधिकार कर लिया गया।

1742 के पश्चात् व्यापारिक लाभ कमाने के साथ-साथ फ्राँसीसियों की महत्त्वकांक्षाएँ भी जागृत हो गईं। इस दौरान फ्राँसीसी गवर्नर डूप्ले का भारतीय राज्यों में हस्तक्षेप और फ्राँसीसी शक्ति का विस्तार हुआ। परिणामस्वरूप अंग्रेज़ों और फ्राँसीसियों के बीच तीन युद्ध हुए, जिन्हें कर्नाटक युद्धके नाम से जाना जाता है।भारत में उस समय कर्नाटक का यह क्षेत्र कोरोमंडल तट पर अवस्थित था। लगभग बीस वर्षों तक दोनों कंपनियों के मध्य संघर्ष चलता रहा। अंततः इस संघर्ष में अंग्रेज़ों की विजय हुई।

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