18वीं शताब्दी में स्थापित नवीन स्वायत्त राज्य

भूमिका

1707 में औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् उत्तर मुगल काल में मुगल बादशाह मात्र प्रतीकात्मक रह गए और उनकी सत्ता की बागडोर ईरानी, तूरानी गुट और हिंदुस्तानी मूल के अमीर सैय्यद बंधुओं के पास आ गई। 18वीं शताब्दी के प्रारंभ से ही वैभवशाली मुगल साम्राज्य का पतन तेजी से होने लगा और मुगल साम्राज्य के इन्हीं अवशेषों पर अनेक क्षेत्रीय राजनीतिक शक्तियों का प्रादुर्भाव हुआ, जिससे कई स्वतंत्र राज्य अस्तित्व में आए। इन स्वतंत्र राज्यों के विवरण निम्नलिखित हैं-

हैदराबाद

हैदराबाद के स्वतंत्र राज्य (आसफजाही वंश) का संस्थापक निजाम-उल-मुल्क (चिनकिलिच खाँ) था। निजाम-उल-मुल्क तूरानी गुट का था। उसने सैव्यद बंधुओं के पतन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

निजाम-उल-मुल्क, मुगल बादशाह मुहम्मद शाह द्वारा दक्कन में नियुक्त सूबेदार था। वर्ष 1720 से 1722 के बीच दक्कन में उसने अपनी स्थिति सुदृढ़ की तथा 1724 में उसने स्वतंत्र राज्य हैदराबाद को स्थापना की।

निजाम-उल-मुल्क ने केंद्रीय सरकार से अपनी स्वतंत्रता की खुलेआम घोषणा कभी नहीं की, मगर व्यवहार में स्वतंत्र शासक के रूप में कार्य किया।

निजाम-उल-मुल्क ने हिंदुओं के प्रति उदार नीति अपनाई, उसने एक हिंदू पूरनचंद को अपना दीवान नियुक्त किया।

निजाम-उल-मुल्क ने दक्कन में जागीरदारी प्रथा को अपनाया तथा राजस्व व्यवस्था में निहित भ्रष्टाचार को समाप्त करने का प्रयास किया।

1724 में सकूरखेड़ा के युद्ध में निजाम उल मुल्क ने मुगल सूबेदार मुबारिज खाँ को पराजित किया। तत्पश्चात् मुगल बादशाह ने निजाम-उल-मुल्क को दक्कन का वायसरायनियुक्त कर दिया और उसे आसफजाह की उपाधि प्रदान की।

1748 में निजाम-उल-मुल्क की मृत्यु के पश्चात् हैदराबाद आंतरिक संघर्ष तथा कर्नाटक के प्रश्न पर अंग्रेजों एवं फ्राँसीसियों की कूटनीति का शिकार बना।

कर्नाटक

कर्नाटक, मुगल दक्कन का एक सूबा था। कर्नाटक के नायब सूबेदार को कर्नाटक का नवाब कहा जाता था।

दिल्ली की सरकार से स्वतंत्र होकर सआदतउल्ला खाँ ने अर्काटको अपनी राजधानी बनाया।

सआदतउल्ला खाँ के बाद उत्तराधिकार के संघषों को लेकर कर्नाटक की स्थिति बिगड़ती गई। फलस्वरूप कर्नाटक के उत्तराधिकार का प्रश्न अंग्रेजों और फ्राँसीसियों के मध्य राजनीतिक हस्तक्षेप का कारण बना।

अंततः कर्नाटक के नवाब मुहम्मद अली और उनके उतराधिकारी पर ब्रिटिश गवर्नर जनरल लॉर्ड वेलेजली ने षड्‌यंत्रात्मक पत्राचार का आरोप लगाकर राजगद्दी का अधिकार छीन लिया।

बंगाल

स्वतंत्र बंगाल राज्य की नींव डालने का श्रेय मुर्शिद कुली खाँ को दिया जाता है। 1700 में मुगल सम्राट औरंगजेब द्वारा मुर्शिद कुली खाँ को बंगाल का दीवान नियुक्त किया गया था। इस समय बंगाल का सूबेदार अजीमुशान था, जो राजदरबार से संबंधित होने के कारण प्रायः दिल्ली में रहता था। अतः बंगाल की वास्तविक शक्ति मुर्शिद कुली खाँ के पास थी। मुगल सम्राट फर्रुखसियर ने मुर्शिद कुली खाँ को 1717 में बंगाल का सूबेदार नियुक्त किया, जिसने आगे चलकर मुगल साम्राज्य की कमजोर स्थिति का फायदा उठाकर स्वतंत्र बंगाल राज्य की नींव रखी।

मुर्शिद कुली खाँ के शासन के दौरान केवल तीन विद्रोह हुए। पहला विद्रोह सीताराम राय, उदय नारायण और गुलाम मुहम्मद ने किया. दूसरा शुजात खाँ ने तथा तीसरा विद्रोह नजात खाँ का था।

मुर्शिद कुली खाँ ने बंगाल की राजधानी ढाका के स्थान पर मुर्शिदाबादको बनाया।

मुर्शिद कुली खाँ ने राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार करते हुए राज्य की वित्तीय व्यवस्था में नए सिरे से प्रबंध किया। उसने अपने नए भू-राजस्व बंदोबस्त के जरिये जागीर भूमि के एक बड़े हिस्से को खालसा भूमि‘ (प्रत्यक्ष रूप से बादशाह के नियंत्रण में रहने वाली भूमि) में तब्दील कर दिया तथा ठेके पर भू-राजस्व वसूली की नई प्रणाली इजारेदारी व्यवस्थाकी शुरुआत की।

मुर्शिद कुली खाँ ने गरीब किसानों को कृषि विकास तथा भू-राजस्व देने में सक्षम बनाने हेतु तकावी ऋणप्रदान किया।

1727 में मुर्शिद कुली खाँ की मृत्यु के पश्चात् उसका दामाद शुजाउद्दीन (1727-1739) बंगाल का नवाब बना। शुजाउद्दीन के बाद उसका बेटा सरफराज खाँ (1739) बंगाल का नवाब बना।

1740 में बिहार के नायब सूबेदार अलीवर्दी खाँ ने सरफराज छाँ को गिरिया (कुछ स्रोतों में घेरिया) के युद्ध में हराकर बंगाल के नवाब का पद हस्तगत कर लिया। इसने तत्कालीन मुगल सम्राट को 2 करोड़ रुपये नजराना देकर अपने पद की स्वीकृति प्राप्त की।

मराठों के हमलों से दबाव में आकर अलीवर्दी खाँ ने रघुजी से 1751 में उड़ीसा प्रांत का एक बड़ा भाग और वार्षिक चौथ के रूप में एक निश्चित धनराशि देकर मराठों से संधि की।

अलीवर्दी खाँ ने अंग्रेजों तथा फ्राँसीसियों को क्रमशः कलकत्ता और बदनगर के किलेबंदी की अनुमति नहीं दी।

अलीवर्दी खाँ ने यूरोपीयों को मधुमक्खियों की उपमा दी थी कि “यदि उन्हें न छेड़ा जाये तो वे शहद देंगी, किंतु छेडा जाये तो काट-काट कर मार डालेंगी।”

1756 में अलीवर्दी खाँ की मृत्यु के बाद उसका दौहित्र (पुत्री का पुत्र) सिराजुद्दौला नवाब बना।

सिराजुद्दौला की मौसी घसीटी बेगम व पूर्णिया का नवाब शौकत जंग, दोनों ही सिराजुद्दौला के प्रबल विरोधी थे। लेकिन सबसे बड़ा शत्रु बगाल की सेना का सेनानायक मीर जाफ़र था। इन सभी ने सिराजुद्दौला के विरुद्ध प्लासी के युद्ध में अंग्रेजी सेना का साथ दिया।

सिराजुद्दौला के समय 20 जून, 1756 में ब्लैक होल की घटनाहुई, जिसका उल्लेख एक अंग्रेज अधिकारी हॉलवेल ने किया। हॉलवेल के अनुसार, “नवाब ने एक छोटी सी कोठरी में 146 अंग्रेजों को बंद कर दिया, जिसमें से महज 23 अंग्रेज ही जिंदा बच पाए।”

सिराजुद्दौला ने 1757 में प्लासी के युद्ध में अंग्रेजों से संघर्ष किया. जिसमें उसकी पराजय हुई। प्लासी के युद्ध के बाद अंग्रेजों का बंगाल पर कब्जा तो नहीं हुआ किंतु कठपुतली नवाब (मीर जाफर) बनाये जाने से उन्हें मनचाहा अधिकार मिल गया।

मीर जाफ़र को इतिहासकारों ने क्लाइव के गीदड़की पदवी दी।

बंगाल नवाब मीर कासिम (1760-63) ने बंगाल की राजधानी मुर्शिदाबाद से मुंगेर स्थानांतरित की।

मुंगेर में तोप व बंदूक का कारखाना स्थापित किया और सेना का पुनर्गठन किया।

22 अक्तूबर, 1764 को बक्सर के युद्ध में बंगाल के अपदस्थ नवाब मीर कासिम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला तथा मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना का अंग्रेजी सेना (नेतृत्व हेक्टर मुनरी) से सामना हुआ। इसमें अंग्रेजों की विजय हुई।

इलाहाबाद की संधि (1765) के द्वारा अंग्रेजों को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी प्रदान कर दी गई।

बगाल के नवाब
मुर्शिद कुली खाँ 1717-1727 ई.
शुजाउद्दीन 1727-1739 ई.
सरफराज खाँ 1739-1740 ई.
अलीवर्दी खाँ 1740-1756 ई.
सिराजुद्दौला 1756-1757 ई.
मीर जाफर 1757-1760 ई.
मीर कासिम 1760-1763 ई.
मीर जाफर (दूसरी बार) 1763-1765 ई.
नज्मुद्दौला 1765-1766 ई.
शैफ-उद्-दौला 1766-1770 ई.

अवध

अवध के स्वायत राज्य का संस्थापक सआदत खाँ (बुरहान-उल-मुल्क) को माना जाता है। उसे 1722 में अवध का सूबेदार बनाया गया था। कालांतर में उसने स्वतंत्र राज्य करना प्रारंभ कर दिया।

सआदत खाँ ने भी 1723 में नया राजस्व बंदोबस्त (रेवेन्यू सेटलमेंट) लागू किया। कहा जाता है कि उचित भू-लगान लगाकर तथा बड़े जमींदारों के जुल्मों से बचाकर उसने किसानों की हालत को बेहतर बनाया।

मुगल सम्राट मुहम्मद शाह से सआदत खाँ ने 7 हजार का मनसब और बुरहान-उल-मुल्ककी उपाधि प्राप्त की थी।

1739 में मुगल सम्राट मुहम्मद शाह ने नादिर शाह से लड़ने के लिये सआदत खाँ को दिल्ली बुलाया।

1739 में सआदत खाँ की मृत्यु के बाद उसका भतीजा तथा दामाद सफदरजंग (अबुल मंसूर खाँ) अवध का नवाब बना।

सफदरजंग के समय अवध में लखनवी तहजीब विकसित हुई।

सफदरजंग 1748 में मुगल बादशाह मुहम्मद शाह से वजीर का पद प्राप्त किया। इसी कारण सफदरजंग को नवाब वजीरके नाम से भी जाना जाता है। इसके साथ ही उसे इलाहाबाद का प्रांत भी दे दिया गया।

1754 में अवध में सफदरजंग मृत्यु हो गई. तत्पश्चात् उसका पुत्र शुजाउद्दौला शासक बना, जिसने मुगल बादशाह शाहआलम द्वितीय (अली गौहर) को शरण दी।

1761 में लड़े गए पानीपत के तृतीय युद्ध में शुजाउद्दौला ने अहमद शाह अब्दाली का साथ दिया।

अंग्रेजों के विरुद्ध बक्सर के युद्ध (1764) में शुजाउद्दौला ने बंगाल के अपदस्थ नवाब मीर कासिम का साथ दिया।

शुजाउद्दौला की मृत्यु के पश्चात् अवध का अगला नवाब आसफुद्दौला (1775-1797) हुआ। इसने अपनी राजधानी फैजाबाद से लखनऊ स्थानांतरित कर ली। लखनऊ में इसने एक बड़ा इमामबाड़ाबनवाया।

अवध का अंतिम नवाब वाजिद अली शाह (1847-1856) था। इसी के कार्यकाल में लॉर्ड डलहौजी ने आउट्टम की रिपोर्ट (सरकारी रिपोर्ट) के आधार पर अवध पर कुप्रशासन का आरोप लगाकर 1856 में इसे अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया।

मैसूर

तालीकोटा के युद्ध के पश्चात् विजयनगर साम्राज्य का अंत हो गया और इसकी कमजोर स्थिति का फायदा उठाकर, जिन स्वतंत्र राज्यों का उदय हुआ, उनमें मैसूर एक प्रमुख राज्य था।

इस समय मैसूर पर वाड्यार वंश का शासन था। इस वंश का अंतिम शासक चिक्का कृष्णराज नाममात्र का शासक था। शासन की वास्तविक बागडोर दो मंत्रियों-नंजराज और देवराज के हाथों में थी।

इस समय मैसूर पर मराठों तथा निजाम के आक्रमण का खतरा बना रहता था। मराठे लगातार मैसूर पर आक्रमण कर उसे वित्तीय और राजनीतिक दृष्टि से कमजोर बनाना चाहते थे, जबकि निजाम मैसूर को मुगल प्रदेश मानकर इस पर अपना अधिकार समझते थे।

हैदर अली का जन्म 1721 (कुछ स्रोतों में 1722) में मैसूर के कोलार जिले में हुआ था। उसने अपना जीवन मैसूर की सेना में एक साधारण अधिकारी के रूप में प्रारंभ किया तथा अपनी योग्यता के दम पर बह सेनापति के पद तक पहुँच गया।

1755 में हिंडीगुलके फौजदार के रूप में हैदर अली ने फ्राँसीसियों की सहायता से एक शस्त्रागार की स्थापना की।

1761 में हैदर अली ने नंजराज को हटाकर, यहाँ की सत्ता हथिया ली। तत्पश्चात् वेदनूर/विदनूर के राजा की मृत्यु पर हैदर अली ने वहाँ कब्जा कर उपशासक नियुक्त किया। सत्ता के आरंभ से ही वह मराठा सरदारों, निजाम और अंग्रेजों के साथ लड़ता रहा।

हैदर अली एक वीर योद्धा और कुशल प्रशासक था। उसने अपने कार्यकाल के दौरान सेना का पुनर्गठन किया, जागीर बाँटने की प्रथा पर रोक लगाई और तोपखानों आदि का निर्माण कराया।

कालीकट पर विजय प्राप्त कर समूचे मालाबार तट पर पहली बार हैदर अली ने अत्यधिक भूमि पर कर लगाया, जहाँ नायरों से उसका संघर्ष हुआ।

हैदर की मृत्यु के बाद मैसूर की गद्दी पर टीपू सुल्तान बैठा जो राजनीतिक दूरदर्शिता में अपने पिता हैदर के समकक्ष ही ठहरता था।

केरल

18वीं सदी की शुरुआत में केरल में 4 प्रमुख राज्य थे कालीकट, चिरक्कल, कोचीन तथा त्रावणकोर।

त्रावणकोर राज्य को राजा मार्तंड वर्मा के नेतृत्व में प्रमुखता मिली। उसने डचों को हराकर केरल में उनकी राजनीतिक सत्ता को समाप्त कर दिया।

मार्तंड वर्मा ने यूरोपीय मॉडल के आधार पर अपनी सेना का संगठन किया तथा उन्हें आधुनिक शस्त्रों से सुसज्जित किया और इन सैनिकों का प्रयोग अपने राज्य विस्तार में किया।

मार्तंड वर्मा ने अपने राज्य में सिंचाई व्यवस्था हेतु नहरों का निर्माण कराया। साथ ही, विदेशी व्यापार को बढ़ाने का प्रयास किया।

मार्तंड वर्मा का उत्तराधिकारी कार्तिक तिरुनल राम वर्मा हुआ। वह प्रसिद्ध विद्वान, कवि, संगीतज्ञ तथा अभिनेता था। वह अंग्रेजी में धाराप्रवाह बातचीत करता था, उसको यूरोपीय मामलों में गहरी रुचि थी। वह लंदन, कलकत्ता एवं मद्रास से निकलने वाले अखबारों एवं पत्रिकाओं को नियमित रूप से पढ़ता था।

18वीं शताब्दी में इस क्षेत्र में मलयालम साहित्यका काफी विकास हुआ। इस काल में त्रावणकोर राज्य की राजधानी त्रिवेंद्रम (तिरुवनंतपुरम) संस्कृत के विद्वानों का प्रमुख केंद्र थी।

18वीं शताब्दी के स्वतंत्र नवीन राज्य एवं उनके संस्थापक
स्वतंत्र राज्यसंस्थापक
हैदराबादनिजाम-उल-मुल्क (चिनकिलिच खाँ)
कर्नाटकसआदतउल्ला खाँ
बंगालमुर्शिद कुली खाँ
अवधसआदत खाँ (बुरहान-उल-मुल्क)
मैसूरहैदर अली
केरल(त्रावणकोर)मार्तंड वर्मा

जाट

जाट खेतिहरों की एक जाति है जो दिल्ली आगरा और युग के समीपवर्ती क्षेत्र में रहते थे।

भरतपुर के जाट राज्य की स्थापना चूरामन (चूणामन) एवं सिंह द्वारा की गई थी।

जाट नेता सूरजमल को जाटों का अफलातून‘ (प्लेटो) कहा जाता है। 1763 में सूरजमल की मृत्यु के बाद जाट राज्य का पतन हो गया।

रुहेलखंड

रुहेलखंड की स्थापना अली मुहम्मद खाँ द्वारा की गई। इसकी पहले राजधानी आँवला (बरेली) थी तथा बाद में रामपुर इसकी राजधानी बनी।

यह इलाका हिमालय की तराई में गंगा तट से कुमाऊँ की पहाड़ तक फैला हुआ अत्यंत उपजाऊ क्षेत्र था।

रुहेलों का अवध, दिल्ली और जाटों से लगातार संघर्ष होता रहा।

रुहेलों के नेता हाफिज रहमत खाँ ने बाहरी आक्रमणों से रक्षा के लिये अवध के नवाब वजीर से संधि की और बदले में 40 लाख रुपये देने की बात की गई।

1773 में रुहेलखंड पर मराठों के आक्रमण के समय अवध के नवाब वजीर ने अंग्रेजी सेना की मदद से उन्हें भगा दिया और संधि के अनुसार रुहेलों से धनराशि मांगी।

रुहेल नेता हाफिज रहमत खाँ द्वारा धनराशि न देने पर अवध ने अंग्रेजों के साथ मिलकर रुहेलों पर आक्रमण किया।

मीरापुरकटरा के युद्ध (अप्रैल 1774) में हाफिज रहमत खाँ लड़ते हुए मारा गया।

अंततः रुहेलों को निर्वासित कर रामपुर का इलाका छोड़कर शेष समस्त क्षेत्र अवध के नवाब शुजाउद्दौला को दे दिया गया।

ईस्ट इंडिया कंपनी ने हाफिज रहमत खाँ के मरने के बाद उसके पुत्र फैजुल्ला खाँ को रामपुर का शासक बना दिया।

पंजाब

मुगल काल में समृद्ध और उपजाऊँ पंजाब प्रांत की राजधानी लाहौर थी

सिखों के 10 गुरु

क्र.सिख गुरुसंबंधित अतिमहत्त्वपूर्ण तथ्य
1.गुरु नानकसिख धर्म के संस्थापक
2.गुरु अंगदसिख धर्म के प्रचार में विशेष योगदान, गुरुमुखी  लिपि का आविष्कारक
3.गुरु अमरदासलंगर प्रथा को स्थायी बनाया, मंझी प्रथा का विस्तार तथा सती प्रथा का विरोध
4.गुरु रामदाससमकालीन अकबर के साथ मैत्री संबंध बनाए, अमृतसर शहर बसाया
5.गुरु अर्जुन देवआदिग्रंथ का संकलन, तरनतारन तथा करतारपुर नामक शहर बसाया, जहाँगीर द्वारा इनकी हत्या कराई गई
6.गुरु हरगोबिंदअमृतसर नगर में अकाल तख्त की स्थापना.   सिखों को लड़ाकू कौम में बदला, कश्मीर में कौरतपुरा नगर बसाया
7.गुरु हर रायदारा शिकोह से अच्छे संबंध, शांत एवं एकांत जीवन व्यतीत किया
8.गुरु हरकिशनचेचक के कारण मृत्यु
9.गुरु तेगबहादुरआनंदपुर साहिब की स्थापना, हिंदू धर्म के प्रबल समर्थक, औरंगजेब द्वारा हत्या
10.गुरु गोबिंद सिंहखालसा पंथ की स्थापना, सिखों में ‘पाहुल प्रचा’ की शुरुआत, औरंगजेब से निरंतर संघर्ष, सिखों के अंतिम गुरु, जफ़रनामा (फारसी) की रचना

मुगलों के साथ निरंतर टकराव से 18वीं शताब्दी में सिखों का उदय एक राजनीतिक शक्ति के रूप में हुआ।

सिखों के दसवें एवं अंतिम गुरु गोबिंद सिंह जी ने व्यक्तिगत गुरुत्व के सिद्धांत को खत्म कर खालसा पंथकी स्थापना की, जिसके कारण सिखों को विशेष वेशभूषा केश, कंघा, कृपाण, कड़ा, कच्छा (पाँच ककार या पाँच कक्के) धारण करना होता है।

गुरु गोबिंद सिंह की मृत्यु के पश्चात् गुरु की परंपरा समाप्त हो गई और इसके बाद बंदा बहादुर ने सिखों का नेतृत्व संभाला।

बंदा बहादुर जिनके बचपन का नाम लक्ष्मणदेवथा, ने पंजाब के सिख किसानों को एकत्रित कर मुगलों से लगातार आठ वर्ष तक संघर्ष किया। बंदा बहादुर को उसके शिष्य सच्चे बादशाहके उपनाम से संबोधित करते थे। 1716 में फर्रुखसियर ने बंदा बहादुर की उसके पुत्र समेत हत्या करवा दी।

बंदा बहादुर की हत्या के बाद थोड़े समय के लिये सिख राज्य का उत्कर्ष थम गया, लेकिन शीघ्र ही मुगल नेतृत्व की अक्षमता और विदेशी आक्रमणकारी नादिर शाह और अहमद शाह अब्दाली के लगातार आक्रमणों के कारण उत्पन्न अव्यवस्था का लाभ उठाकर थोड़े समय के लिये मंद पड़े सिख राज्यों को पुनः उत्कर्ष हुआ।

अहमद शाह अब्दाली के भारत से वापस जाने पर सिखों ने पुनः पंजाब एवं जम्मू राज्य पर अधिकार कर लिया।

फैजलपुर के कपूर सिंह के नेतृत्व में पुनः पंजाब के सिख कृषकों, जो पृथक् पृथक् जत्थों में बँटे थे, को संगठित कर एक ऐसे दल के रूप में विकसित किया गया, जो दल खालसाके रूप में अस्तित्व में आया।

सिखों की धार्मिक सेना के रूप में विकसित दल खालसाको कपूर सिंह की मृत्यु के बाद इसका नेतृत्व जस्सा सिंह अहलूवालियाने संभाला।

जस्सा सिंह के नेतृत्व में ही सिख 12 स्वतंत्र मिसलों या जत्थों में संगठित हो चुके थे तथा राज्य के विभिन्न हिस्सों में अपना कार्य कर रहे थे।

प्रत्येक मिसल की पहचान उनका एक झंडा, नाम तथा निशान होता था। सभी मिसलों के नेताओं की एक संयुक्त समिति होती थी, जो सभी मिसलों के कार्यों का क्रियान्वयन करती थी।

1753 में दल खालसाने बाहरी आक्रमणों से उत्पन्न अव्यवस्था के हल के लिये राखी प्रथाआरंभ की।

राखी प्रथाके अंतर्गत प्रत्येक गाँव से उपज का 1/5 भाग लेकर दल खालसाउसकी सुरक्षा का प्रबंध करता था। इस प्रणाली के द्वारा सिखों का राजनीतिक शक्ति के रूप में विकास हुआ।

बारह मिसलों में से सुकरचकिया मिसलमें जन्मे रणजीत सिंह को काफी ख्याति प्राप्त हुई। ये इतिहास में शेर-ए-पजाब के नाम से प्रसिद्ध हैं।

मराठा

मुगल साम्राज्य के पतन के क्रम में 18वीं शताब्दी में मराठा सर्वाधिक शक्तिशाली राज्य था।

1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद बहादुरशाह प्रथम द्वारा शिवाजी के पौत्र शाहूजी को मुगलों की केद से आजाद कर दिया गया।

मुगलों की कैद से आजाद होकर शाहू ने सतारा को अपना केंद्र बनाया।

इसी समय राजाराम की विधवा पत्नी ताराबाई ने अल्पवयस्क पुत्र शिवाजी द्वितीय की सत्ता पर दावेदारी को लेकर विरोध जताया। ध्यातव्य है कि ताराबाई मराठों में सर्वाधिक शक्तिशाली महिला थी।

इस तरह सत्ता पर एकछत्र राज को लेकर शाहू और ताराबाई में संघर्ष प्रारंभ हो गया।

मराठा सत्ता की दावेदारी को लेकर शाहू एवं ताराबाई के बीच चल रहे संघर्ष में विभिन्न मराठा सरदारों ने किसी-न-किसी पक्ष का साथ दिया।

शाहू ने संघर्ष के बाद शासन प्रबंध की देखभाल पेशवा को सौंप दी। अतः इस तरह मराठा इतिहास में पेशवाओं के आधिपत्य की शुरुआत हुई और पेशवा बालाजी विश्वनाथ के साथ पद वंशानुगत हो गया।

1713 में शाहू ने बालाजी विश्वनाथ को पेशवा बनाया। बालाजी विश्वनाथ ने अपनी दक्ष कूटनीतिक क्षमता की बदौलत कई मराठा सरदारों को शाहू के पक्ष में किया। बालाजी विश्वनाथ को शिवाजी के बाद मराठा राज्य का दूसरा संस्थापक माना जाता है।

बालाजी विश्वनाथ ने चौधएवं सरदेशमुखीकर वसूल करने का अधिकार विभिन्न मराठा सरदारों को दे दिया।

बालाजी विश्वनाथ ने सैय्यद बंधुओं का साथ देकर (फर्रुखसियर को गद्दी से हटाने में) उनके साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए।

1720 में बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु हो गई। इसके बाद उसका पुत्र बाजीराव प्रथम पेशवा बना।

बाजीराव प्रथम (1720-40) एक प्रतिभावान सेनापति एवं एक महत्वाकांक्षी राजनेता था।

हिंदू नायकों की सहानुभूति जगाने तथा उनका समर्थन प्राप्त करने के लिए बाजीराव ने हिंदू पद पादशाहीके आदर्श का प्रचार किया।

बाजीराव प्रथम, शिवाजी के पश्चात् गुरिल्ला युद्ध पद्धति का सबसे बड़ा प्रतिपादक था।

इसने जीवन भर दक्कन में निजाम-उल-मुल्क की शक्ति को नियंत्रित करने का प्रयास किया। इसने मुगल अधिकारियों को विशाल इलाके से चौथ वसूल करने का अधिकार देने और फिर वे इलाके मराठा राज्य को सौंप देने के लिये मजबूर किया।

इसने पुर्तगालियों के खिलाफ अभियान कर सालसेट एवं बसीन पर कब्जा कर लिया।

बाजीराव प्रथम ने मराठा राज्य को एक साम्राज्य के रूप में तब्दील कर दिया। बाजीराव प्रथम ने मुगलों के प्रति अपनी नीति स्पष्ट करते हुए कहा कि, “हमें जर्जर वृक्ष के तने पर प्रहार करना चाहिये, शाखाएँ तो अपने आप गिर जाएंगी।”

अंततः 1740 में इसकी मृत्यु हो गई। बाजीराव की मृत्यु तक मराठों ने मालवा, गुजरात और बुंदेलखंड के हिस्सों पर अधिकार कर लिया था।

बाजीराव प्रथम की मृत्यु के बाद उसका पुत्र बालाजी बाजीराव मराठा पेशवा नियुक्त हुआ। बालाजी बाजीराव को नाना साहबके नाम से भी जाना जाता है।

1749 में शाहू‌जी की मृत्यु के बाद पेशवा की शक्ति में और बढ़ोतरी हो गई। अब पेशवा हो राज्य का सर्वोपरि था।

1757 में मुगलों द्वारा मराठों के सहयोग से अहमदशाह अब्दाली के प्रतिनिधि नजीबुद्दौला को मीर बख्शी के पद से तथा पंजाब में अब्दाली के पुत्र राजकुमार तैमूर को अपदस्थ करने के कारण कालांतर में पानीपत के तृतीय युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार हुई।

14 जनवरी, 1761 में हुए पानीपत के तृतीय युद्ध में मराठा सेना का नेतृत्व सदाशिव राव भाऊ ने किया। मराठों की तोप टुकड़ी का प्रमुख इब्राहिम गार्टी था।

पानीपत के तृतीय युद्ध में अहमदशाह अब्दाली ने सदाशिव राव भाऊ के नेतृत्व वाले मराठों को परास्त किया।

पानीपत के तृतीय युद्ध में मराठा सेनापति सदाशिवराव भाऊ और विश्वास राव दोनों मारे गए और पेशवा को इसकी सूचना इस रूप में दी गई “युद्ध में दो मोती विलीन हो गए तथा बड़ी संख्या में धन एवं जन की हानि हुई।”

इस युद्ध में पराजय को बालाजी बाजीराव सहन नहीं कर सका और 1761 में उसकी मृत्यु हो गई।

पानीपत के तृतीय युद्ध का प्रत्यक्षदर्शी वर्णन काशीराज पंडित ने किया।

माधव राव (1761-72) 17 वर्ष की उम्र में पेशवा बना। वह प्रतिभाशाली सैनिक और राजनेता था।

उसने हैदराबाद के निजाम को हराया, मैसूर के हैदर अली को नजराना देने के लिये विवश किया और राजपूत, रुहेलों तथा जाट सरदारों को अपने अधीन लाकर उत्तर भारत पर अपने अधिकार को फिर से स्थापित किया।

1771 में मराठे मुगल बादशाह शाहआलम द्वितीय को दिल्ली वापस लाए। मुगल बादशाह अब मराठों का पेंशनभोगी बन गया।

1772 (कुछ स्रोतों में 1771) में माधव राव का क्षय रोग से निधन हो गया। उसकी मृत्यु के बाद पुणे में बालाजी बाजीराव के छोटे भाई रघुनाथ राव और माधवराव के छोटे भाई नारायण राव के मध्य सत्ता के लिये संघर्ष आरंभ हो गया।

ग्रांट डफ के अनुसार “पानीपत का युद्ध मराठा साम्राज्य के लिये इतना हानिकारक सिद्ध नहीं हुआ, जितना कि इस श्रेष्ठ शासक का असामयिक देहांत हानिकारक रहा।”

माधव राव के बाद उसका छोटा भाई नारायण राव (1772-73) पेशवा बना, लेकिन सत्ता पर अधिकार को लेकर एक वर्ष बाद 1773 ई. में उसके चाचा रघुनाथ राव ने उसकी हत्या कर दी।

पेशवा नारायण राव की हत्या कर रघुनाथ राव अंग्रेजों की शरण में भाग गया जबकि नया पेशवा माधव नारायण राव अल्पवयस्क था । पुणे में माधव नारायण राव के समर्थकों और रघुनाथ राव के समर्थका के मध्य लगातार षड्यंत्र चल रहे थे। इस समय माधव नारायण राव को मराठा सरदारों द्वारा गठित बारा भाई परिषद ने संरक्षण प्रदान किया। इस परिषद् में नाना फड़नवीस प्रमुख थे।

इसी के काल में प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-1782) हुआ।

सात वर्षों तक यह युद्ध चलता रहा। अंततः दोनों पक्षों ने इसकी निष्फलता को भाँपकर सालबाई की संधिकरने का निर्णय किया।

सालबाई की संधि (1782) के बाद माधव नारायण राव को पेशवा स्वीकार कर लिया गया। सालसेट तथा थाना द्वीप अंग्रेजों को दिया गया।

इस समय उत्तर के मराठा शासकों में सर्वाधिक शक्तिशाली मराठा नेता महादजी सिंधिया थे। उसने फ्राँसीसी और पुर्तगाली अफसरों और बंदूकधारियों की सहायता से एक शक्तिशाली फौज खड़ी की एवं आगरा के पास शस्त्र निर्माण के कारखाने स्थापित किये।

महादजी की सलाह पर ही मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय ने पेशवा को नायब-ए-गुनायबबनाया।

महादजी के बाद मराठा शक्ति नाना फड़नवीसके हाथों में केंद्रित हो गई।

महादजी सिंधिया और फडनवीस की कठोरता से दुःखी होकर माधव नारायण राव ने आत्महत्या कर ली। महादजी की मृत्यु 1795 में, जबकि नाना फड़नवीस की 1800 में हुई।

इसी बीच अनेक मराठा सरदारों ने अर्द्ध-स्वतंत्र राज्य बना लिये जिसमें प्रमुख थे- बड़ौदा के गायकवाड़, इंदौर के होल्कर, नागपुर के भोंसले और ग्वालियर के सिंधिया। इनकी अपनी सेना थी तथा पेशवा के प्रति उनकी निष्ठा नाममात्र की थी।

माधव राव नारायण के पश्चात् रघुनाथ राव का अयोग्य पुत्र बाजीराव द्वितीय पेशवा बना।

यह एक अकुशल शासक था जिसने अपना पद बचाए रखने के लिए एक अधिकारी का दूसरे अधिकारी से मतभेद कराया। इससे मराठा बंधुत्व पर गहरा धक्का लगा।

1802 में बाजीराव द्वितीय से अंग्रेजों ने बसीन की संधिकी। सिंधिया और भोंसले ने इस संधि का कड़ा विरोध किया। इस संधि के कारण पेशवा कंपनी के प्रभुत्व में आ गया। बाजीराव द्वितीय के समय द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803-1805) हुआ।

द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध में अंग्रेजों की विजय हुई। सिंधिया, भोंसले तथा होल्कर के अधिकांश क्षेत्र अंग्रेजों के अधीन आ गए

तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1816-1819) में भी मराठा हार गए। इसके बाद पेशवा का पद हमेशा के लिये समाप्त हो गया। बाजीराव द्वितीय को अंग्रेजों ने वार्षिक पेंशन देकर कानपुर के निकट बितूर भेज दिया।1851 में बाजीराव द्वितीय की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने उसके पुत्र नाना साहब (धोंधू पंत) को पेंशन देने से इनकार कर दिया। प्रतिशोध स्वरूप नाना साहब ने 1857 के विद्रोह में सक्रिय हिस्सा लिया। अंग्रेजों द्वारा दमन प्रक्रिया आरंभ होने पर वह नेपाल भाग गया।

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